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अत्याचारी मनुष्य

अधोलोक में भी हे मनुज, हाथ तुम फेरो
भवित्वयता छुपी है जहाँ वहीं तुम टेरो

क्या बैठे हो यहाँ नहीँ कल तेरा है
कुत्सित कलंक का केवल डेरा है

झकझोरो अपने सोये हुए भंवर को
करो सफल तुम अपने अग्र डगर को

यह जगह तो केवल उस अभिमानी का है
तेरे आँखों से बहते हुए विवश पानी का हे

हे कार्य प्रवंचक उसका, केवल छलता है
शठ इसी मार्ग पर सदा गमन करता है

कुछ और नहीं, बस हाल मेरा तुम देखो
विश्वास नहीं तो पासा दूसरा फेंको

दुर्दान्त दस्यु को सेल हुलते हें हम
यम द्रंष्टा से खेल झूलते हें हम

वैसे तो कोई बात नहीँ कहने को
हें इसमें मजबूर सिर्फ सहने को

पहली आहुति है अभी,यज्ञ चलना है
इसी अनल में क्या सबको जलना है

जब ह्रदय-ह्रदय पावक से भर जायेगा
इक दिन सारा पाप उतर जायेगा

यह नहीं कथा किसी और की,
अभिमानी का है
उस दुष्ट, क्रूर,कायर,कृतघ्न बेईमानी का है

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