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बच्चों के साथ बेहतर संवाद कैसे हो ?

बेहतर संवाद कैसे हो? अब सवाल उठता है कि आखिर कक्षा में शिक्षक और बच्चों के बीच बेहतर संवाद का क्या मतलब है ? कक्षा में बच्चों और शिक्षक के मध्य संवाद या बच्चों के बीच आपसी संवाद या किसी के भी मध्य बेहतर संवाद का मतलब होता है कि संवाद में भाग लेने वाले सभी लोगों और पक्षों को अपनी बात कहने का अवसर मिलें। सभी अपनी बात बगैर किसी डर के कह सकें, क्योंकि संवाद में पद, लिंग, जाति, धर्म या और किसी भी वजह से डर होने पर संवाद का स्तर बहुत ही निम्न कोटी का हो जाता है। सामने वाला अपनी बात कहना चाहता है मगर किसी ना किसी डर की वजह से वह अपनी बात नहीं कह पाता। इस तरह को कोई भी अवरोध संवाद को एकतरफा और बहुत ही अलोकतांत्रिक बना देता है। बोझिल और नीरस बना देता है।  संवाद में ध्यान रखना होता है कि वक्ता हमेशा सरल भाषा का इस्तेमाल करें। सरल भाषा मतलब आम बोलचाल की भाषा जिसे कोई भी आसानी से समझ सकें। वक्ता अपनी बात कहते समय सहज और आत्मविश्वास के साथ रहें। आपस में बात कर रहें दो लोगों का एक-दूसरे के प्रति भरपूर सम्मान भी होना चाहिए, अगर बात कर रहें दो लोग एक-दूसरे का सम्मान नहीं करेंगे तो बातची...

आँख के आंसू

आँख  के  आँसू ढ़लकता देखकर जी तड़प कर के हमारा रह गया क्या गया मोती किसी का है बिखर या हुआ पैदा रतन कोई नया || ओस की बूँदें कमल से है कहीं या उगलती बूँद है दो मछलियाँ  या अनूठी गोलियाँ चांदी मढ़ी खेलती है खंजनों की लड़कियाँ || या जिगर पर जो फफोला था पड़ा फूट कर के वह अचानक बह गया हाय था अरमान, जो इतना बड़ा आज वह कुछ बूँद बन कर रह गया || पूछते हो तो कहो मैं क्या कहूँ यों किसी का है निरालापन भया दर्द से मेरे कलेजे का लहू देखता हूँ आज पानी बन गया || प्यास थी इस आँख को जिसकी बनी वह नहीं इस को सका कोई पिला प्यास जिससे हो गयी है सौगुनी वाह क्या अच्छा इसे पानी मिला || ठीक कर लो जाँच लो धोखा न हो वह समझते हैं सफर करना इसे आँख के आँसू निकल करके कहो चाहते हो प्यार जतलाना किसे || आँख के आँसू समझ लो बात यह आन पर अपनी रहो तुम मत अड़े क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह जब कि दिल में से निकल तुम यों पड़े || हो गया कैसा निराला यह सितम भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया यों किसी का है नही खोते भरम आँसुओं तुमने कहो यह क्या किया ||

सरिता

किसे खोजने निकल पड़ी हो, जाती हो तुम कहा चली। ढली रंगतों में हो किसकी, तुम्हें छल गया कौन छली ।। क्यों दिन रात अधीर बनी सी, पड़ी धरा पर रहती हो । दु:सह आतप शीत वात सब दिनों किस लिये सहती हो ।। कभी फैलने लगती हो क्यों, कृश तन कभी दिखाती हो। अंग भंग कर कर क्यों आपे, से बाहर हो जाती हो ।। कौन भीतरी पीड़ाएँ, लहरें बन ऊपर आती हैं। क्यों टकराती ही फिरती हैं, क्यों काँपती दिखाती है ।। बहुत दूर जाना है तुमको, पड़े राह में रोड़े हैं। हैं सामने खाइयाँ गहरी, नहीं बखेड़े थोड़े हैं ।। पर तुमको अपनी ही धुन है, नहीं किसी की सुनती हो। का टों में भी सदा फूल तुम, अपने मन के चुनती हो।। उषा का अवलोक वदन, किस लिये लाल हो जाती हो। क्यों टुकड़े टुकड़े दिनकर की, किरणों को कर पाती हो।। क्यों प्रभात की प्रभा देखकर, उर में उठती है ज्वाला। क्यों समीर के लगे तुम्हारे, तन पर पड़ता है छाला।।

संध्या

दिवस का अवसान समीप था, गगन था कुछ लोहित हो चला । तरु शिखा पर थी अब राजती, कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा ।। विपिन बीच विहंगम वृंद का, कल निनाद विवर्धित था हुआ । ध्वनिमयी विविधा विहगावली, उड़ रही नभ मंडल मध्य थी ।। अधिक और हुई नभ लालिमा, दश दिशा अनुरंजित हो गयी। सकल पादप पुंज हरीतिमा, अरुणिमा विनिमज्जित सी हुई ।। झलकते पुलिनो पर भी लगी, गगन के तल की वह लालिमा । सरित और सर के जल में पड़ी, अरुणता अति ही रमणीय थी।। अचल के शिखरों पर जा चढ़ी, किरण पादप शीश विहारिणी। तरणि बिंब तिरोहित हो चला, गगन मंडल मध्य शनै: शनै:।। ध्वनिमयी करके गिरि कंदरा, कलित कानन केलि निकुंज को। मुरलि एक बजी इस काल ही, तरणिजा तट राजित कुंज में।।

प्रेम गीत

हे प्रिय, मुझको प्यार करने दे, हे प्रिय, मुझको प्यार करने दे।। तू है मेरे मन की राधा, अंग हमारी तू है आधा || कमी प्रीत की नहीं है मन में प्यार करूँगा हद से ज्यादा || मैं  भंवरा तू कली है गोरी मँडराने दे थोड़ी थोड़ी || तेरे प्रेम अगन में मुझको जलने दे, हे प्रिय मुझको प्यार करने दे हे प्रिय मुझको प्यार करने दे |  प्रेम तेरा है मेरे नस नस में, मन है मेरा तेरे ही बस में | कैसे चीर दिखाऊँ सीना, मैं  कोई हनुमान नहीँ हूँ | तस्वीर ह्रदय में तेरा ही है, मैं  कोई भगवान नहीँ हूँ |

धरती की पुकार

ओ मंडराते काले बादल,          बिन बरसे मत जाना रे लगी आँख है राह तुम्हारे         आकर प्यास बुझाना रे  बहा रही हे आँसु मिट्टी            अँकुर कितने सूख गए बन कर काल सूर्य की धरने            जन स्मित को लील गए। हे नीरद है विनती,लोटा दे तू           अब इनका मुस्काना रे ओ काले मंडराते बादल           बिन बरसे मत जाना रे। केवल आँसु ही आँसु हें            अब इनके गलियारों में खो गये हें सुख सारे इनके             इस हरारत के अँधियारों में शूल हरो संताप हरो           हर लो इनका घबराना रे ओ मंडराते काले बादल           ...

भोले भाले बादल (बाल कविता )

मन से भोले भाले होते        बादल काले काले होते कुछ रहते हें मुँह लटकाये      कुछ तो देखो तोंद फुलाए आसमान में दौड़ा करते        बरसा थोड़ा थोड़ा करते देखो बच्चों को धमकाए      ...