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दिव्यांगता अभिशाप है ?

आज समाज केवल शारीरिक रूप से संपन्न एवं धनी व्यक्तियों का ही सम्मान करता है l में आज बात करता हूँ एक अपने अंगों से निशक्त लोगों की जिनकी समाज में लोग मज़ाक उड़ाते है एवं उन्हें हेय दृष्टि से देखते है l व्यस्क एवं बुजुर्ग को तो छोडिये एक नासमझ बच्चा भी उसका मजाक बनाते नही हिचकिचाते हैं l      एक व्यक्ति या बच्चें का क्या दोष अगर उनका कोई अंग विकसित नहीं हो पाया तो ,पर लोग उनके पूर्व जन्म के पापों का फल समझ उनसे घृणा करते है l अब वैसे बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों को कौन समझाए की उनका अनुमान कितना सही है l एक दिव्यांग व्यक्ति का जरा सा भी दोष नहीं होता अपने इस स्थिति का l          मैं आज एक विद्यालय गया था l मैंने देखा एक दिव्यांग बच्चा , जो शारीरिक रूप से तो अपंग है परन्तु मानसिक रूप से सशक्त है l फिर भी बाकि बच्चे उससे दुरी बना कर रखे थे l उसके साथ कोई भी बच्चा न तो बैठना चाहता है और न ही उससे दोस्ती करना चाहता है l मैंने जब बाकि बच्चों से इस रवैये का कारण पूछा तो बच्चों ने बताया – “उसके हाथ-पांव जैसे है कहीं मैं भी वैसा हो ग...

खोरठा लिपि

खोरठा लिपि खोरठा लिपि : एक परिचय खोरठा लिपि में क+अ - का माना गया है और लिखने के क्रम में आकार मात्रा अलग से लगाया जाता है। खोरठा लिपि मेें क$अ - का लिखा और पढ़ा भी जाता है। अलग आकार की मात्रा खोरठा लिपि में नहीं लगाया जाता है। इसी पाँच स्वर वर्ण को मात्रा की जगर हुबहु लिखा और पढ़ा जाता है। जैसे - क+अ- का, क+इ- कि, क+इइ-की, क+ए- के, क+एए- कै, क+उ- कु, क+उउ- कू, क+ए- के, क+एए- कै, क+उ- कु, क+उउ- कू, क+अउ- को, क+अउउ- कौ के अलावे खोरठा लिपि में ’ओ’ स्वतंत्र वर्ण है। खोरठा भाषा के उच्चारण में आधा वर्ण नहीं होता है और न ही संयुक्ताक्षर अक्षर या शब्द होते हैं। ऐसे में इस खोरठा लिपि का प्रयोग खोरठा लेखन में सरलता से किया जा सकता है। खोरठा में जो संयुक्ताक्षर के शब्द प्रचलित हैं वे पूर्णतः संस्कृत अथवा अन्य भाषा के शब्द हैं, बोल चाल में भी स्टेशन को ’टिसन’ और व्याकरण को ’बेयाकरन’ उच्चारण किया जाता है।

खोरठा हमारी- मातृभाषा

खोरठा लिपि खोरठा के लिए खोरठा लिपि ही क्यों ? किसी भाषा की कतिपय अपनी विशिष्ट ध्वनियाँ होती हैं। उन विशिष्ट ध्वनियों को किसी अन्य भाषा के लिए प्रयुक्त लिपि में अंकित करना कठिन होता है। यानी उधार की लिपि में किसी भाषा के लेखन-पठन में मानकर चलने की विवशता आ जाती है। यदि जो लिखा जाये वही पढ़ा जाये की आदर्श स्थिति की अपेक्षा करना है तो उस भाषा की पृथक व स्वतंत्र लिलि की आवश्यकता पड़ती है। खोरठा सहित झारखंडी भाषाओं में कुछ विशिष्ट ध्वनियाँ विद्यमान हैं जो भारत की अन्य भाषाओं में प्रायः दुर्लभ है। यद्यपि खोरठा भाषा को अंकित करने में नागरी लिपि के व्यवहार को सर्वाधिक मान्यता मिली है किंतु हमारी सभी ध्वनियों को नागरी लिपि उदभाषित करने में सक्षम नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें मान कर चलने की विवशता उत्पन्न होती है। इस विवशता में कई समस्याएँ हैं, जहाँ लेखन में वर्त्तनीगत अराजकता वहीं पाठगत अनेकरूपता। एक लेखक अपनी भाषा की विशिष्ट ध्वनियों के लिए नागरी की जिन ध्वनियों का व्यवहार करता है, वहीं दूसरा लेखक कुछ और ध्वनियों का। इससे सामान्य पाठक को पाठ वाचन में कठिनाइयों का सामना करन...

बुनियाद कार्यक्रम झारखण्ड

अधिगम उन्नयन कार्यक्रम:- यह एक अधिगम उन्नयन कार्यक्रम है l  जिसमे निम्न बिन्दुओं पर जोर दिया गया है l    बच्चों को अपनी रूचि,क्षमता तथा सिखने की गति के अनुसार सिखने का अवसर           बच्चों के स्तर के अनुसार शिक्षक-अधिगम प्रक्रिया (गतिविधियाँ)           बच्चों के घर,परिवेश,भाषा एवं संस्कृति को महत्व           बच्चों के सिखने में अभिभावक/समुदाय की सकारात्मक भूमिका           बच्चों द्वारा सीखने , प्रश्न करने, महसूस करने, अनुभव करना, स्वयं कर के देखने, प्रयोग करने, पढने , चर्चा करने, सुनने , प्रतिक्रिया करने तथा स्वयं को बोलकर ,गति द्वारा अथवा लिखक र अभिव्यक्त करने पर बल           शिक्षक के सहयोग से,समूह में ,जोड़े में तथा स्वयं करके सिखने पर बल           विद्यालय के अन्दर एवं बाहर भी सक्रिय अधिगम की सम्भावना           सभी बच्चो का सामान रूप से सीखना सुनिश्चित करना   ...

बच्चों के साथ बेहतर संवाद कैसे हो ?

बेहतर संवाद कैसे हो? अब सवाल उठता है कि आखिर कक्षा में शिक्षक और बच्चों के बीच बेहतर संवाद का क्या मतलब है ? कक्षा में बच्चों और शिक्षक के मध्य संवाद या बच्चों के बीच आपसी संवाद या किसी के भी मध्य बेहतर संवाद का मतलब होता है कि संवाद में भाग लेने वाले सभी लोगों और पक्षों को अपनी बात कहने का अवसर मिलें। सभी अपनी बात बगैर किसी डर के कह सकें, क्योंकि संवाद में पद, लिंग, जाति, धर्म या और किसी भी वजह से डर होने पर संवाद का स्तर बहुत ही निम्न कोटी का हो जाता है। सामने वाला अपनी बात कहना चाहता है मगर किसी ना किसी डर की वजह से वह अपनी बात नहीं कह पाता। इस तरह को कोई भी अवरोध संवाद को एकतरफा और बहुत ही अलोकतांत्रिक बना देता है। बोझिल और नीरस बना देता है।  संवाद में ध्यान रखना होता है कि वक्ता हमेशा सरल भाषा का इस्तेमाल करें। सरल भाषा मतलब आम बोलचाल की भाषा जिसे कोई भी आसानी से समझ सकें। वक्ता अपनी बात कहते समय सहज और आत्मविश्वास के साथ रहें। आपस में बात कर रहें दो लोगों का एक-दूसरे के प्रति भरपूर सम्मान भी होना चाहिए, अगर बात कर रहें दो लोग एक-दूसरे का सम्मान नहीं करेंगे तो बातची...

आँख के आंसू

आँख  के  आँसू ढ़लकता देखकर जी तड़प कर के हमारा रह गया क्या गया मोती किसी का है बिखर या हुआ पैदा रतन कोई नया || ओस की बूँदें कमल से है कहीं या उगलती बूँद है दो मछलियाँ  या अनूठी गोलियाँ चांदी मढ़ी खेलती है खंजनों की लड़कियाँ || या जिगर पर जो फफोला था पड़ा फूट कर के वह अचानक बह गया हाय था अरमान, जो इतना बड़ा आज वह कुछ बूँद बन कर रह गया || पूछते हो तो कहो मैं क्या कहूँ यों किसी का है निरालापन भया दर्द से मेरे कलेजे का लहू देखता हूँ आज पानी बन गया || प्यास थी इस आँख को जिसकी बनी वह नहीं इस को सका कोई पिला प्यास जिससे हो गयी है सौगुनी वाह क्या अच्छा इसे पानी मिला || ठीक कर लो जाँच लो धोखा न हो वह समझते हैं सफर करना इसे आँख के आँसू निकल करके कहो चाहते हो प्यार जतलाना किसे || आँख के आँसू समझ लो बात यह आन पर अपनी रहो तुम मत अड़े क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह जब कि दिल में से निकल तुम यों पड़े || हो गया कैसा निराला यह सितम भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया यों किसी का है नही खोते भरम आँसुओं तुमने कहो यह क्या किया ||

सरिता

किसे खोजने निकल पड़ी हो, जाती हो तुम कहा चली। ढली रंगतों में हो किसकी, तुम्हें छल गया कौन छली ।। क्यों दिन रात अधीर बनी सी, पड़ी धरा पर रहती हो । दु:सह आतप शीत वात सब दिनों किस लिये सहती हो ।। कभी फैलने लगती हो क्यों, कृश तन कभी दिखाती हो। अंग भंग कर कर क्यों आपे, से बाहर हो जाती हो ।। कौन भीतरी पीड़ाएँ, लहरें बन ऊपर आती हैं। क्यों टकराती ही फिरती हैं, क्यों काँपती दिखाती है ।। बहुत दूर जाना है तुमको, पड़े राह में रोड़े हैं। हैं सामने खाइयाँ गहरी, नहीं बखेड़े थोड़े हैं ।। पर तुमको अपनी ही धुन है, नहीं किसी की सुनती हो। का टों में भी सदा फूल तुम, अपने मन के चुनती हो।। उषा का अवलोक वदन, किस लिये लाल हो जाती हो। क्यों टुकड़े टुकड़े दिनकर की, किरणों को कर पाती हो।। क्यों प्रभात की प्रभा देखकर, उर में उठती है ज्वाला। क्यों समीर के लगे तुम्हारे, तन पर पड़ता है छाला।।